Tuesday, August 31, 2010

पैसे की तंगी नहीं अब अहं करवाता है घरों में झगड़े


केस-1

पत्नी सुनीता (बदला हुआ नाम) ने उनके पति सुरेन्द्र (बदला हुआ नाम) पर आरोप लगाया कि वह मार-पीट करता है और दूसरी महिला के साथ उसका संबंध भी है । जब दोनों आरोपी और आवेदक दोनों पक्ष आयोग के सामने आए और अपनी-अपनी बातें रखीं, तो पाया गया कि कलह की मुख्य वजह पति-पत्नी का अहंकार है.  इस अहंकार और कलह के परेशान हो दम्पत्ति की बड़ी बेटी ने आत्महत्या कर ली । आयोग ने दोनों को सझाहिश दी और उनके बाकी दो बच्चों की खारित सही ढंग से रहने को कहा ।

केस-2

पत्नी निकिता ने महिला आयोग में गुहार लगाई कि उनका पति रमेश शाराब पीकर मारता-पीटता है । पत्नी की गुहार पर पति-पत्नी को आयोग बुलाया गया और समझाने पर पति ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और मार-पीट न करने का वादा किया। सुलह के बावजूद पत्नी ने अपनी आत्म संतुष्टि के लिए सास-ससुर, चाचा सास-ससुर और ससुराल पक्ष के दूसरे लोगों पर दहेज प्रताडऩा का आरोप लगा दिया। जबकि, महिला ससुराल पक्ष से दूर अपने पति के साथ रहती है ।

केस-3

पति-पत्नी की शादी भोपाल में ही हुई थी, लेकिन बाद में दोनों दिल्ली में रहने लगे। पति-पत्नी दोनों ही महिला आयोग पहुंचे, पति को शिकायत थी कि पत्नि उनके मन-मुताबिक खाना नहीं बनाती हर काम अपनी मर्जी से करती है जबकि पत्नी का कहना था कि उनका पति उन्हें और घर के कामों को समय नहीं देता है। आयोग की समझाहिश पर बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए पति-पत्नी ने आपस में समझौता किया ।

ये सिर्फ तीन उदाहरण हैं, वास्तविक आकडे तो कुछ  और ही कहते है. पारिवारिक कलह की वजहें भी अब समय के साथ बदलती जा रही हैं। महिला आयोग के पास आने वाली शिकायतों पर एक सरसरी नजर डालें तो समझ में आएगा कि पारिवारिक कलह की वजह पर पैसों की तंगी के बजाय पति-पत्नी के बीच अहंकार होता है । विशेषज्ञों की मानें तो करीब आयोग के पास आने वाले पारिवारिक कलह के केस में करीब 90 प्रतिशत का मूल बिंदु अहंकार या आत्म सम्मान ही होता है।

महिलाएं जागरुक पर पुरुष नहीं
दरअसल, समय के बदलाव के साथ महिलाओं में उनके अधिकारों के प्रति जागरु·ता आई है, जबकि पुरुष अभी भी महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाने को लेकर खुद की विचार धारा बदल नहीं पाए हैं। परिवार में पति-पत्नी की बहस होने का मुख्य कारण यही होता है कि यदि पत्नी किसी मुद्दे पर अपने विचार रखती है तो पति उसे एक्सपेट नहीं कर पाता.  कई बार इस चीज को परिवार की बुजुर्ग महिलाएं भी मर्यादा तोडऩे की तरह मानती हैं।

10 प्रतिशत मुद्दे ही कोर्ट के लायक
आज के समय में आयोग के पास सबसे अधिक केस पारिवारिक कलह के आते हैं। जिसमें से करीब 90 प्रतिशत ऐसे होते हैं, जिनमें कलह की मुख्य वजह अहंकार या स्वाभिमान होता है । आयोग के पास आने वाले पारिवारिक कलह के केवल 10 प्रतिशत केस ही ऐसे होते हैं, जिसमें कलह की वजह वास्तव में ऐसी होती है, जिसको सुलझाने के लिए कोर्ट का सहारा लेना जरूरी होता है। पहले परिवार में विवाद की वजह पैसों की तंगी हुआ करती थी, लेकिन अब अहंकार गरीब और अमीर हर स्तर में परिवार में अशांति फैलाने का ही काम कर रहा है.
ताकि उज्जवल को बच्चों का भविष्य
पति-पत्नी के विचारों में विभिन्नता ही विवाद और फिर इसके बाद पारिवारिक कलह को जन्म देती है । यदि पति-पत्नी उनके परिवार और बच्चों के भविष्य के भविष्य को प्राथमि·ता दें तो अहम आड़े नहीं आएगा और कलह की वजह ही समाप्त हो जाएगी। अधि·तर मामलों में मेरी समझाहिश होती है कि बच्चों के उज्जवल भविष्य के खातिर पति-पत्नी दोनों आपस में समझौता कर लें ।
- उपमा राय, मेम्बर, मप्र राज्य महिला आयोग

Sunday, August 29, 2010

जननी सुरक्षा में शिशु को भूल गई सरकार

प्रदेश में पिछले सालों से नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के अंर्तगत आंगनवाड़ी कार्यकताओं और एएनएम को स्तनपान को लेकर जागरुकता फैलाने का काम किया जा रहा है। फिर भी, संस्थागत प्रसव दर 78 प्रतिशत होने के बाद भी सही समय पर स्तनपान प्रारंभ कराने का प्रतिशत मात्र 43 प्रतिशत ही है.  ऐसे में स्तनपान जागरुकता को लेकर सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम पर एक बड़ा सवालिया निशान लग जाता है.
जननी सुरक्षा योजना का शायद जितना अच्छा आंकड़ा प्रदेश में है उतना शायद ही किसी दूसरे राज्य में हो। लेकिन, जननी को सुरक्षित रख, शिशु के पोषण की ओर ध्यान ही न देना आखिर कहां का न्याय है.  जननी सुरक्षा और डिस्ट्रिक्ट लेवल हाउस होल्ड एंड फेसेलिटी सर्वे के आंकड़ों को आमने-सामने रखें, तो यह बात साफ होती है कि सरकार को जननी की सुरक्षा का तो ध्यान है, लेकिन नवजात शिशु के भरण-पोषण और स्वास्थ्य की जरा भी चिंता नहीं है. 
मात्र 43 प्रतिशत बच्चों को ही मां का दूध

यदि डिस्ट्रिक्ट लेवल हाउस होल्ड एंड फेसेलिटी सर्वे-3 के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि प्रदेश में सालभर में पैदा हुए कुल बच्चों में से केवल 43 प्रतिशत को ही जन्म के एक घंटे के भीतर मां का दूध मिल पाता है.  जबकि, वैज्ञानिकों के मुताबिक यदि जन्म के पहले एक घंटे के भीरत स्तनपान प्रारंभ करा दिया जाए, तो कुपोषण को 19 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है । संख्या पर जाएं तो वर्ष 2007-08 में लगभग 18 लाख बच्चों में से 10 लाख बच्चों के जन्म के पहले घंटे में मां का दूध नसीब ही नहीं हो पाया. 

इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी 78 प्रतिशत

सरकार द्वारा चलाई जा रही जननी सुरक्षा योजना का एक मात्र उद्देश्य मां व शिशु की रखा करना और प्रदेश में शिशु व मातृ मृत्युदर को घटना। योजना के अंतर्गत सरकार विभिन्न स्तरों पर काम कर संस्थागत प्रसव का प्रतिशत तो बढ़ा कर 78 प्रतिशत कर लिया, लेकिन बच्चे के स्वास्थ्य पर अभी भी किसी का ध्यान नहीं है । वर्ष 2007-08 में जहां संस्थागत प्रसव 71.05 प्रतिशत है, वहीं पहले घंटे में स्तनपान मात्र 43 प्रतिशत ही है । अब, सवाल यह उठता है कि जब प्रदेश में 70 प्रतिशत से अधिक प्रसव संस्थागत हो रहे हैं, तो प्रशिक्षण प्राप्त एएनएम कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सुपरवाइजर और नर्स होने के बावजूद वे स्तनपान को 70 प्रतिशत तक क्यों नहीं पहुंचा पा रहे।

आंकड़े ये कहते हैं-

शुरुआती 1 घंटे में स्तनपान - 43.1 प्रतिशत

0-5 माह में   सिर्फ स्तनपान - 51.5 प्रतिशत

6 माह तक  सिर्फ स्तनपान - 31.1 प्रतिशत

6-9 माह तक  स्तनपान व अल्पठोस आहार - 39.6 प्रतिशत