Sunday, September 26, 2010

नाक कटवाने पर ही तुले हो... जो जी में आये करो!

कॉमनवेल्थ गेम्स... कि तैयारियों कि जिस तरह से पोल पट्टी जिस तरह से रोज़ रोज़ खुल रही...उसे देख अब शहर का आम आदमी यही कह रहा है. शुरुआत तो पहले ही हो गई थी... कॉमन वेल्थ में घोटालो के साथ...लेकिन मेहमान नवाजी में अव्वल मने जाने वाले इस देश में कॉमनवेल्थ कि तैयारियां इतनी कमज़ोर होंगी... इसका किसी को अंदाज़ा भी न था. अब तैयारियों में किस कतरह कि खामियां सामने आई है... मुझे लगता है कि ईससे आप सभी वाकिफ होंगे...लेकिन जो नहीं वाकिफ है.. उनकी जानकारी के लिए सिर्फ इतना ही बताना चाहूंगी कि... कॉमनवेल्थ कि शुरुआत के एक महीने पहले विशेष रूप से  तैयार फुट ओवर ब्रिज गिर पढ़ा... शीला दीक्षित इस ब्रिज के गिरने को लेकर मीडिया को सफाई ही दे रही थीं कि इसी दौरान एक वाल सीलिंग चाट से नीचे आ गई. वहीं, दो दिनों बाद एक और देशभक्त ने खेलगाओं में स्टिंग कर दिया. जहा फैली अव्यवस्थाओं को देख तो कई विदेशी खिलाडियों ने आपने नाम ही वापस ले लिए.
इस तरह कॉमन वेल्थ देशों के सामने नाक कटाने से तो आचा होगा कि कॉमनवेल्थ के पहले ही हथनी कुन्ड को शीला दीक्षित खुलवा दें... और पूरी दिल्ली के बाढ़ में डूबने के बाद इमरजेंसी  घोषित कर कॉमन वेल्थ गेम्स को तलवा दिया जाये... हालाँकि मेरा ये सुझाव हो सकता है कि दिल्ली के बासिंदों को न भाए.... लेकिन कम से कम इससे देश कि नाक तो काटने से बच ही जाएगी.  

Monday, September 13, 2010

आखिर कब तक अफवाहों पर जलता रहेगा ये देश...?

 अमेरिका में कुरान की प्रतियाँ जला देने की अफवाह पर आज लगभग पूरा कश्मीर जल उठा. शायद यही वजह है लगातार काम होने के बाद भी देश  अभी भी प्रगतिशील ही है. यूँ  अफवाहें जब तक देश के कभी एक तो कभी दुसरे शहर को जलाती राहेंगी. तब तक देश की तरक्की यूँ ही ख़ाक होती रहेगी. कोई तो समझे इन लोगो  को कि अफवाहों से ध्यान हटा... जरा अपने देश के बारे में भी सोचें  और कुरान -गीता के नाम पर झगडे नहीं.

Saturday, September 11, 2010

आखिर कैसे शुरू होगा एमटेक कोर्स?

 गरीबों की बस्ती में अगर कार का विज्ञापन करें, तो लोगों के बीच चर्चा तो जरूर होगीे, लेकिन कोई गरीब इसे खरीदनेकी हिम्मत नहीं जुटा सकेगा। बस, ऐसा ही कुछ हुआ मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद और इग्नु द्वारा शुरू किए गए एमटेक कोर्स के साथ। अखबारों में विज्ञापन के छपने के बाद परिषद के पास जानकारी मांगने के लिए करीब 250 लोगों ने फोन तो किया, लेकिन आखिरी तारीख के निकल जाने के बाद भी मात्र 15 अप्लीकेशन ही जमा हो पाए।
नहीं मिल रही एनओसी
केवल प्रोफेशनल्स के लिए इस कोर्स को डिजाइन किया गया था, जिसमें प्रोफेशनल्स को छह महीने की रेगुलर क्लास रूम स्टडी करना आवश्यक है। कोर्स को करने के लिए पूरे देश से 250 से अधिक लोगों ने अपना रुझान तो दिखाया, लेकिन जैसे ही छह महीने भोपाल आकर क्लासरूम स्टडी की बात आई, सभी पीछे हट गए। दरअसल, वे कंपनियां और सरकारी संस्थान जहां के प्रोफेशनल्स कोर्स करने के इच्छुक थे, ने काम प्रभावित होने के डर से छह महीने की रेगुलर क्लासेस के लिए उनके एम्पलॉइज को नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) ही नहीं प्रदान की।
संभावना कि एक साल बाद शुरू हो कोर्स
इग्नु और एमपीसीएसटी की प्लानिंग के मुताबिक जुलाई से एमटेक कोर्स की शुरुआत की जानी थी, लेकिन इसके लिए अभी तक मात्र 15 अप्लीकेशन आने के कारण कोर्स की शुरुआत नहीं की जा सकी। अधिक एडमीशन के लिए सरकारी कर्मचारियों के लिए अप्लीकेशन सब्मिशन की तारीख भी आगे बढ़ा दी गई। सूत्रों के मुताबिक, चार स्पेशलाइजेशन (जियोस्पेशियल, बायोटेक, रूरल टेक्रोलॉजी और कंप्यूटेशनल) में एमटेक के लिए निर्धारित 72 सीटों की तुलना में यदि सम्मान जनक संख्या में अप्लीकेशन फॉर्म नहीं आए, तो यह संभावनाएं प्रबल हैं कि कोर्स को अगले साल से शुरू किया जाए।
केवल तीन ही सरकारी कर्मचारी
इस कोर्स में एक ओर जहां सरकारी कर्मचारियों को एडमिशन में प्राथमिकता देने की बात की गई थी, वहीं परिषद के पास आई 15 अप्लीकेशंस में सरकारी कर्मचारियों के आवेदनों की संख्या मात्र 3 हैै। एक खास चीज यह भी सामने आई कि परिषद के पास जमा हुई 12 अप्लीकेशंस में बिल्डर्स, प्राइवेट कॉलेज संचालक और प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारी अधिक मात्रा में शामिल हैं। वहीं अगर चार स्पेशलाइजेश पेपर्स में लोगों के रुझान पर नजर डालें, तो सभी की पहली पसंद जियोस्पेशियल और दूसरी रूरल टेक्नोलॉजी हैं।
नहीं था पांच साल का अनुभव
चौंकाने वाली बात तो यह रही कि अधिकतर सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं के कोर्स के लिए इच्छुक कर्मचारी अर्हताओं को पूरा नहीं कर सके। दरअसल, कोर्स में एडमिशन के लिए प्रोफेशनल का बीटेक की डिग्री के बाद पांच साल जॉब एक्सपीरियंस होना जरूरी रखा गया था, लेकिन करीब 90 प्रतिशत प्रोफेशनल्स के पास बीटेक की डिग्री के बाद केवल एक या दो साल का ही एक्सपीरियंस पाया गया।

Thursday, September 9, 2010

बधाई! बाल श्रमिक मुक्त है शहर...?

सर्वेक्षण रिपोर्ट के आंकड़ों को फेर-बदल के साथ प्रस्तुत करने की सरकार की पुरानी आदत है, लेकिन इस बार सरकार ने सुतुरमुर्ग की तरह परेशानी से मुंह ही मोड़ लिया और निश्चिंत बैठ गई । हाल ही, सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में सामने आया कि भोपाल में पिछले दो सालों से कोई बाल श्रमिक नहीं है, जबकि वास्तविक स्थिति से आज प्रदेश का हर एक व्यक्ति परिचित है ।

सच्चाई से मुंह मोड़ती सरकार का  एक नया उदाहरण फिर से एक रिपोर्ट में सामाने आया । हर चार कदम पर दुकानों में पंचर बनाते या ढ़ाबे पर चाय पिलाते छोटू के मिलने के बावजूद सरकारी आंकड़े कहते हैं कि राजधानी में पिछले दो सालों से एक भी बाल मजदूर नहीं है । ऐसी स्थिति में बाल मजदूर के पुनर्वास की कार्यभार से सरकार खुद को मुक्त मानती है । अब सवाल यह उठता है कि आखिर बाल श्रमिकों को ढ़ाबों, रेस्टोरेंट, होटलों और घरेलू कामों से मुक्ति दिलाने के लिए कौन से हाथ आगे आएंगे, जबकि सरकार ही आंखों पर पट्टी बांध कर चैन से बैठी हो।

एक भी बाल श्रमिक नहीं
10 अक्टूबर 2006 से पहले चाइल्ड लेबर ऐक्ट में सिर्फ खतरनाक और गैरखतरनाक कामों में लिप्त बच्चों के पुनर्वास का प्रावधान था, लेकिन अक्टूबर में हुई संशोधन के बाद ऐक्ट में ढ़ाबे, होटल, रेस्टोरेंट और घरों में काम करने वाले बच्चों को भी बाल श्रमिकों में जोड़ लिया गया। सूचना के अधिकार के तहत स्वयंसेवी संस्था विकास संवाद ने जब श्रम मंत्रालय से बाल श्रमिकों के पुनर्वास की जानकारी मांगी तो मंत्रालय द्वारा सूचना प्राप्त हुई कि, संशोधन के बाद भोपाल जिले में बाल श्रमिकों का निरीक्षण लगातार किया गया, जिसमें भोपाल कार्यक्षेत्र में पिछले दो सालों में किसी भी बाल श्रमिक को चिन्हित नहीं किया गया।

केवल एक नियोजक पर जुर्माना
शहर की किसी भी गली में चाय-पान-गुटके की दुकान या पंचर बनाने की दुकान पर आपको छोटू काम करता मिलेगा। यहां तक की सरकारी दफ्तरों में भी बड़े साहब के लिए समय पर चाय पिलाने वाला भी अक्सर छोटू और मुन्ना जैसे ही बच्चे होते हैं, जिन्हें पैसों के लिए रोजाना 10 से 12 घंटे काम करना पड़ता है  । जबकि, मंत्रालय द्वारा प्राप्त जानकारी में बताया गया कि कानून में संसोधन के बाद हुए निरीक्षण में अभी तक मात्र 07 लोग पाए गए, जिनके यहां बाल श्रमिक काम कर रहे थे। इन 7 लोगों में अभी केवल एक ही व्यक्ति पर 10 हजार रुपए की राशि का जुर्माना किया गया है.  जबकि, बाकी सभी आरोपियों की कार्रवाही जारी है ।

पुनर्वास पर ध्यान दे सरकार
इस तरह के आंकड़े देने का मतलब साफ है कि सरकार वास्तवि·ता से मुंह मोड़ रही हैै। गली-मोहल्लों और घरों में काम करने वाले आए दिन नजर आते हैं। इस तरह मुंह मोडऩे से काम नहीं चलेगा। फर्जी आकंड़ेबाजी करने से अच्छा होगा कि बच्चों का पुनर्वास किया जाए।
- शीला खन्ना, अध्यक्ष, मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग 

Tuesday, September 7, 2010

कहां जाएगा प्रदेश का खतरनाक कचरा ?

दूसरे राज्यों के खतरनाक कचरे के प्रबंधन को लेकर राज्य और केन्द्र सरकार एक ओर जहां खींच-तान में लगी है, वहीं हर साल एक लाख साठ हजार मेट्रिक टन से भी अधिक खतरनाक कचरा पैदा कर रहे मध्यप्रदेश के वैज्ञानिक और अधिकारियों को इसके प्रबंधन की चिंता ही नहीं है। हैजारडस वेस्ट मैनेजमेंट के लिए तीन साइट्स को बनाने के सुप्रीम कोर्ट को दिए गए आश्वासन के 7 साल बाद भी अभी तक प्रदेश में एक ही ऐसी साइट तैयार हो पाई, जहां खतरनाक कचरे का प्रबंधन किया जाता है ।

हर साल लाखों टन खतरनाक कचरा
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से मिले आंकड़ों के मुताबिक, हर साल प्रदेश से करीब 1 लाख 67 हजार 889 मेट्रिक टन कचरा नि·लता है। जिसमें 34,943 टन डिस्पोज करने योग्य, करीब 1 लाख 27 हजार मेट्रिक टन कचरा रिसाइकल करने योग्य होता है, जबकि 5037 मेट्रिक टन कचरे को केवल इनसीनिरेटर में ही डिस्पोज किया जा सकता है । अगर वास्तविक स्थिति की बात करें तो खतरनाक कचरा प्रबंधन के लिए एक मात्र साइट पीथमपुर में भी इनसीनिरेटर पूरी तरह से चालू हालत में नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, साइट के डवलप हो जाने के बाद 2006 में शुरू हो जाने वाल इनसीनिरेटर की विर्किंग भी मई महीने में ही शुरू हो पाई है।

सिर्फ एक ही कंपनी को ठेका
मप्र प्रदेश में हजारों की संख्या में औद्योगिक कंपनियां चलाई जा रही हैं, इसके बावजूद पिछले 10 सालों से प्रदेश में सिर्फ एक ही कंपनी (रैमकी इनविरो इंजीनियरिंग लिमिटेड) को खतरनाक कचरा प्रबंधन का चार्ज प्रदेश सरकार द्वारा दिया गया है।

भोपाल के पास भी चिन्हित थी साइट
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड से प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में 3 स्थानों भोपाल, जबलपुर और पीथमपुर को खतरनाक कचरा प्रबंधन के लिए साइट्स तैयार करने के लिए चिन्हित किया गया था, जबकि अभी तक सिर्फ एक ही साइट (पीथमपुर) को डेवलप किया गया । सवाल यह उठता है कि करीब 7 साल पहले चिन्हित तीन साइट्स में से पीथमपुर को ही डेवलप करने के लिए क्यों चुना गया, जबकि गैस त्रासदी के बाद यूका से निकलने वाले खतरनाक कचरे का प्रबंधन उस समय में भी चिंता का गंभीर विषय था। वहीं अब सरकार द्वारा यूका के खतरनाक कचरे के प्रबंधन के लिए करीब 300 करोड़ रुपए की राशि सैंक्शन की है। यह कचरा प्रबंधन साइट अगर भोपाल में होती तो जाहिर सी बात है कि प्रबंधन में इतनी ज्यादा धनराशि खर्च नहीं करनी पड़ती।

भविष्य की प्लानिंग में 9 साइट्स और
मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एक ओर जहां एक ही साइट को डेवलप कर लेने के बाद खतरनाक कचरा प्रबंधन की समस्या को लेकर संतुष्ट है, वहीं सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने रिपोर्ट में साफ किया है कि प्रदेश में औद्योगिक विकास को देखते हुए आगामी सालों में नौ अन्य स्थानों सतना, छिंदवाड़ा, खरगौन, भिंड, गुना, बैतूल, नरसिंगपुर, झाबुआ और देवास को भी खतरनाक कचरा प्रबंधन साइट बनाने के लिए चिन्हित किया है।

एक ही साइट से चल जाएगा काम
आज से छह साल पहले तीन साइट्स में से एक पर काम शुरू किया गया था, उस समय परिस्थितियों के मुताबिक पीथमपुर बेस्ट साइट लगी होगी। फिलहाल, प्रदेश का पूरा खतरनाक कचरा पिछले 4 सालों से पीथमपुर साइट में एब्जॉर्ब हो रहा है, अभी किसी दूसरी साइट की जरूरत नहीं है। अगर होगी, तो बाकी चिन्हित साइट्स का विकास किया जाएगा ।
    डॉ. आपले, वरिष्ठ वैज्ञानिक, खतरनाक कचरा प्रबंधन, मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

Saturday, September 4, 2010

केवल 0.5 प्रतिशत को मिला जननी सुरक्षा योजना का फायदा

आखिर कितने प्रतिशत सुरक्षित है जननी...?  
 सरकार भले ही महिला उत्थान के लिए लाड़ली लक्ष्मी और जननी सुरक्षा योजनाएं शुरू करे, लेकिन महिलाओं के साथ छल और धोखाधड़ी का सिलसिला हमेशा जारी रहेगा। यह बात हाल ही हुए जिला स्तरीय निरीक्षण के परिणामों को देखकर आसानी से कही जा सकती है। इस निरीक्षण में सामाने आया कि जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत संस्थागत प्रसव पर तो सरकार ने पूरा जोर लगा दिया लेकिन योजना के अंतर्गत आने वाले दूसरे कामों की सरकार को सुध ही नहीं है।

वर्ष 2005 में महिलाओं को संस्थागत प्रसव और बेहतर स्वास्थ्य के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार द्वारा जननी सुरक्षा योजना व नेशनल मेटरनिटी बेनिफिट स्कीम(एनएमबीएस) की शुरुआत हुई। इन योजनाओं का एक अहम हिस्सा घरेलु प्रसव पर महिलाओं को सहायता राशि भी देना था। लेकिन, पिछले चार सालों में इस योजना का लाभ प्रदेश की केवल 1 प्रतिशत महिलाओं को ही मिल पाया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन
2005 में योजना की शुरुआत के बाद भी दो सालों में घरेलु प्रसव पर महिलाओं को सुविधा मुहैया न होने पर सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवम्बर 2007 को योजना के पूर्ण क्रियान्वयन का आदेश दिया। आदेश के बाद भी वर्ष 2007-08 में जब महिलाओं को योजना का लाभ नहीं मिला। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर 2008 को एक बार फिर कैबिनेट सचिव को योजना को सुचारू रूप से चलाने के लिए फटकार लगाई। बावजूद, इसके वर्ष 2008-09 योजना के अंतर्गत लाभान्वित होने वाली महिलाओं का प्रतिशत 0.8 प्रतिशत घट गया।

केवल 0.5 प्रतिशत को मिला फायदा
नेशनल मेटरनिटी बेनिफिट स्कीम के अंतर्गत घरेलू प्रसव पर महिलाओं को उनकी उम्र और उनके बच्चो  की संख्या के आधार पर 500 रुपए देने की योजना है। योजना के अंतर्गत सहायाता राशि महिलाओं को 8 से 12 महीनों के भीतर प्राप्त हो जानी चाहिए। जबकि, अगर जिला स्तरीय स्वास्थ्य निरीक्षण-3 के आंकड़ों पर जाएं, तो प्रदेश में वर्ष 2005-06 के बीच किसी भी महिला को घरेलु प्रसव पर सहायता राशि प्राप्त नहीं हुई। जबकि, वर्ष 2006-07 में मात्र 0.4 प्रतिशत महिलाओं को योजना के अंतर्गत राशि उपलब्ध करावाई गई। सुप्रीम कोर्ट के सुधार संबंधी आदेश के बाद वर्ष 2007-08 में यह प्रतिशत बढ़ कर 1.8 पर पहुंचा। जो एक बार फिर वर्ष 2008-09 में 0.8 प्रतिशत घट गया। सीधे शब्दों में कहें, तो दोबारा आदेश के बाद भी लाभान्वित महिलाओं की संख्या मात्र एक प्रतिशत ही रही।

लाभ से दूर कई राज्य
2005 में शुरू हुई इस योजना के अंतर्गत पिछले चार सालों में घरेलु प्रसव प्र·रणों में लाभ पाने वाली महिलाओं का प्रतिशत 0.59 रहा। गुना, छिंदवाड़ा, मंदसौर, टीकमगढ़, छतरपुर, भिंड और मुरैना प्रदेश के कुछ ऐसे जिले हैं, जहां घरेलू प्रसव का प्रतिशत काफी ज्यादा है, जबकि ये राज्य योजनों के लाभों से बहुत दूर हैं। वहीं प्रदेश में विकास के मामले में सबसे आगे माने जाने वाले भोपाल और जबलपुर जिले में भी अभी तक किसी भी महिलए को घरेलु प्रसव प्रकरण पर सरकार द्वारा लाभ नहीं मिला। जबकि होशंगाबाद, हरदा, मुरैना, छतरपुर, टीकमगढ़, मंदसौर, जबलपुर और छिंदवाड़ा कुछ ऐसे जिले हैं, जहां पिछले चार सालों में किसी भी महिला को घरेलू प्रसव पर लाभ नहीं मिला।

Thursday, September 2, 2010

नारे और मुद्दों की जगह पसरा है सन्नाटा

अब न कॉलेजों में नारे होते हैं, हर क्लासरूम की दीवारों पर छात्र नेताओं के पोस्टर और न ही समस्याएं...क्योंकि अब छात्र नेता का चुनाव इलेक्शन से नहीं बल्कि सलेक्शन से होता हैै। इस साल भी राज्य सरकार पुरानी अप्रत्यक्ष प्रणाली से छात्र नेता के चयन की तैयारी में जुटी है, वहीं विद्यार्थी परिषद और एनएसयूआई द्वारा प्रत्यक्ष प्रणाली के छात्र नेता के इलेक्शन की मांग को लेकर अड़े हुए हैं।

कोचिंग में बिजी रहते हैं नेता
इस बार चुनाव के लिए अक्टूबर के पहले सप्ताह का समय दिया गया है । सरकार इस बार भी अप्रत्यक्ष प्रणाली से कॉलेज के टॉपर को छात्र नेता बनाने की तैयारी में है, लेकिन हमारी डिमांड है कि छात्र नेता सभी छात्रों की सहमति से ही चुना जाए। यह कहना है अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की प्रांतीय मंत्री भारती कुम्भारे का । भारती ने बताया कि अक्सर अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुने हुए नेता अपनी पढ़ाई और कोचिंग में लगे रहते हैं और कॉलेज की समस्याओं को संघ के समक्ष नहीं रखते। ऐसे नेता होने का कोई मतलब नहीं निकलता ।

समस्याओं में नहीं लेते इंट्रेस्ट
हमारा देश डेमोक्रेटिक व्यवस्था पर चलता है और इसी लिए कॉलेज स्तर पर चुने जाने वाले नेता की चयन प्रक्रिया भी डेमोक्रेटिक ही होनी चाहिए। जो टॉपर है, जरूरी नहीं कि उसमें लीडरशिप क्वालिटी भी हो। यह मानना है एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष आकाश आहुजा का । आकाश कहते हैं कि सिर्फ अंक अच्छे लाना, व्यक्ति को ऑलराउंडर की श्रेणी में नहीं खड़ा करता । इस संबंध में हमने मुख्यमंत्री से आग्रह भी किया है कि छात्र संघ के छात्र नेता का चयन प्रत्यक्ष प्रक्रिया से करवाने की अनुपति दें। अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुने जाने वाले छात्र नेता भविष्य में राजनीति की राह पर नहीं चल पाते, जबकि वर्तमान समय में राजनीति में सभी बड़े पदाधिकारी छात्र नेता के चुनावों से ही आए हैं।

1-२ प्रतिशत ही उठाते हैं प्रॉब्लम
प्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव होने के पक्ष में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कहना है कि पिछले तीन सालों में जिन भी नेताओं का चयन अप्रत्यक्ष प्रणाली से किया गया, वे कॉलेज व विद्यार्थियों की समस्याओं पर गौर नहीं फरमाते। अधिकतर कॉलेजों में स्थिति यह रहती है कि गोपनीय ढंग से चुने गए छात्र नेता का नाम भी कॉलेज के विद्यार्थियों को पता नहीं होता, ऐसे में समस्याएं और समाधान का प्रश्न ही नहीं खड़ा होता। विद्यार्थी परिषद की प्रांतीय मंत्री भारती के मुताबिक, पिछले तीन सालों में चुने हुए छात्र नेताओं में केवल 1 या 2 प्रतिशत ही नेताओं का चयन हो पाया है, जो समस्याओं को प्रशासन के सामने उठाने या उन पर उचित कार्यवाही करने में रुझान रखते हों।

खत्म हो गया चुनावी माहौल
अगर बात कॉलेज में माहौल की करें, तो स्टूडेंट हो या प्रोफेसर्स... सभी के बीच चुनावों को लेकर जो उत्साह होता था, वो बिलकुल जीरो हो चुका है । चुनाव के कारण एक महीने पहले ही कॉलेज में सुधार के सभी बिंदुओं को मुद्दों के रूप में चिन्हित कर लिया जाता था, लेकिन अब न ही छात्रों के पास मुद्दे होते हैं और न ही कोई सुधार बिंदु। मजे की बात तो यह कि गुप्त रूप से चयन प्रणाली के कारण इलेक्शन डे को छात्र छुट्टी की तरह देखते हैं और कॉलेज ही नहीं आते।

Tuesday, August 31, 2010

पैसे की तंगी नहीं अब अहं करवाता है घरों में झगड़े


केस-1

पत्नी सुनीता (बदला हुआ नाम) ने उनके पति सुरेन्द्र (बदला हुआ नाम) पर आरोप लगाया कि वह मार-पीट करता है और दूसरी महिला के साथ उसका संबंध भी है । जब दोनों आरोपी और आवेदक दोनों पक्ष आयोग के सामने आए और अपनी-अपनी बातें रखीं, तो पाया गया कि कलह की मुख्य वजह पति-पत्नी का अहंकार है.  इस अहंकार और कलह के परेशान हो दम्पत्ति की बड़ी बेटी ने आत्महत्या कर ली । आयोग ने दोनों को सझाहिश दी और उनके बाकी दो बच्चों की खारित सही ढंग से रहने को कहा ।

केस-2

पत्नी निकिता ने महिला आयोग में गुहार लगाई कि उनका पति रमेश शाराब पीकर मारता-पीटता है । पत्नी की गुहार पर पति-पत्नी को आयोग बुलाया गया और समझाने पर पति ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और मार-पीट न करने का वादा किया। सुलह के बावजूद पत्नी ने अपनी आत्म संतुष्टि के लिए सास-ससुर, चाचा सास-ससुर और ससुराल पक्ष के दूसरे लोगों पर दहेज प्रताडऩा का आरोप लगा दिया। जबकि, महिला ससुराल पक्ष से दूर अपने पति के साथ रहती है ।

केस-3

पति-पत्नी की शादी भोपाल में ही हुई थी, लेकिन बाद में दोनों दिल्ली में रहने लगे। पति-पत्नी दोनों ही महिला आयोग पहुंचे, पति को शिकायत थी कि पत्नि उनके मन-मुताबिक खाना नहीं बनाती हर काम अपनी मर्जी से करती है जबकि पत्नी का कहना था कि उनका पति उन्हें और घर के कामों को समय नहीं देता है। आयोग की समझाहिश पर बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए पति-पत्नी ने आपस में समझौता किया ।

ये सिर्फ तीन उदाहरण हैं, वास्तविक आकडे तो कुछ  और ही कहते है. पारिवारिक कलह की वजहें भी अब समय के साथ बदलती जा रही हैं। महिला आयोग के पास आने वाली शिकायतों पर एक सरसरी नजर डालें तो समझ में आएगा कि पारिवारिक कलह की वजह पर पैसों की तंगी के बजाय पति-पत्नी के बीच अहंकार होता है । विशेषज्ञों की मानें तो करीब आयोग के पास आने वाले पारिवारिक कलह के केस में करीब 90 प्रतिशत का मूल बिंदु अहंकार या आत्म सम्मान ही होता है।

महिलाएं जागरुक पर पुरुष नहीं
दरअसल, समय के बदलाव के साथ महिलाओं में उनके अधिकारों के प्रति जागरु·ता आई है, जबकि पुरुष अभी भी महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाने को लेकर खुद की विचार धारा बदल नहीं पाए हैं। परिवार में पति-पत्नी की बहस होने का मुख्य कारण यही होता है कि यदि पत्नी किसी मुद्दे पर अपने विचार रखती है तो पति उसे एक्सपेट नहीं कर पाता.  कई बार इस चीज को परिवार की बुजुर्ग महिलाएं भी मर्यादा तोडऩे की तरह मानती हैं।

10 प्रतिशत मुद्दे ही कोर्ट के लायक
आज के समय में आयोग के पास सबसे अधिक केस पारिवारिक कलह के आते हैं। जिसमें से करीब 90 प्रतिशत ऐसे होते हैं, जिनमें कलह की मुख्य वजह अहंकार या स्वाभिमान होता है । आयोग के पास आने वाले पारिवारिक कलह के केवल 10 प्रतिशत केस ही ऐसे होते हैं, जिसमें कलह की वजह वास्तव में ऐसी होती है, जिसको सुलझाने के लिए कोर्ट का सहारा लेना जरूरी होता है। पहले परिवार में विवाद की वजह पैसों की तंगी हुआ करती थी, लेकिन अब अहंकार गरीब और अमीर हर स्तर में परिवार में अशांति फैलाने का ही काम कर रहा है.
ताकि उज्जवल को बच्चों का भविष्य
पति-पत्नी के विचारों में विभिन्नता ही विवाद और फिर इसके बाद पारिवारिक कलह को जन्म देती है । यदि पति-पत्नी उनके परिवार और बच्चों के भविष्य के भविष्य को प्राथमि·ता दें तो अहम आड़े नहीं आएगा और कलह की वजह ही समाप्त हो जाएगी। अधि·तर मामलों में मेरी समझाहिश होती है कि बच्चों के उज्जवल भविष्य के खातिर पति-पत्नी दोनों आपस में समझौता कर लें ।
- उपमा राय, मेम्बर, मप्र राज्य महिला आयोग

Sunday, August 29, 2010

जननी सुरक्षा में शिशु को भूल गई सरकार

प्रदेश में पिछले सालों से नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के अंर्तगत आंगनवाड़ी कार्यकताओं और एएनएम को स्तनपान को लेकर जागरुकता फैलाने का काम किया जा रहा है। फिर भी, संस्थागत प्रसव दर 78 प्रतिशत होने के बाद भी सही समय पर स्तनपान प्रारंभ कराने का प्रतिशत मात्र 43 प्रतिशत ही है.  ऐसे में स्तनपान जागरुकता को लेकर सरकार द्वारा चलाए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम पर एक बड़ा सवालिया निशान लग जाता है.
जननी सुरक्षा योजना का शायद जितना अच्छा आंकड़ा प्रदेश में है उतना शायद ही किसी दूसरे राज्य में हो। लेकिन, जननी को सुरक्षित रख, शिशु के पोषण की ओर ध्यान ही न देना आखिर कहां का न्याय है.  जननी सुरक्षा और डिस्ट्रिक्ट लेवल हाउस होल्ड एंड फेसेलिटी सर्वे के आंकड़ों को आमने-सामने रखें, तो यह बात साफ होती है कि सरकार को जननी की सुरक्षा का तो ध्यान है, लेकिन नवजात शिशु के भरण-पोषण और स्वास्थ्य की जरा भी चिंता नहीं है. 
मात्र 43 प्रतिशत बच्चों को ही मां का दूध

यदि डिस्ट्रिक्ट लेवल हाउस होल्ड एंड फेसेलिटी सर्वे-3 के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि प्रदेश में सालभर में पैदा हुए कुल बच्चों में से केवल 43 प्रतिशत को ही जन्म के एक घंटे के भीतर मां का दूध मिल पाता है.  जबकि, वैज्ञानिकों के मुताबिक यदि जन्म के पहले एक घंटे के भीरत स्तनपान प्रारंभ करा दिया जाए, तो कुपोषण को 19 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है । संख्या पर जाएं तो वर्ष 2007-08 में लगभग 18 लाख बच्चों में से 10 लाख बच्चों के जन्म के पहले घंटे में मां का दूध नसीब ही नहीं हो पाया. 

इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी 78 प्रतिशत

सरकार द्वारा चलाई जा रही जननी सुरक्षा योजना का एक मात्र उद्देश्य मां व शिशु की रखा करना और प्रदेश में शिशु व मातृ मृत्युदर को घटना। योजना के अंतर्गत सरकार विभिन्न स्तरों पर काम कर संस्थागत प्रसव का प्रतिशत तो बढ़ा कर 78 प्रतिशत कर लिया, लेकिन बच्चे के स्वास्थ्य पर अभी भी किसी का ध्यान नहीं है । वर्ष 2007-08 में जहां संस्थागत प्रसव 71.05 प्रतिशत है, वहीं पहले घंटे में स्तनपान मात्र 43 प्रतिशत ही है । अब, सवाल यह उठता है कि जब प्रदेश में 70 प्रतिशत से अधिक प्रसव संस्थागत हो रहे हैं, तो प्रशिक्षण प्राप्त एएनएम कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सुपरवाइजर और नर्स होने के बावजूद वे स्तनपान को 70 प्रतिशत तक क्यों नहीं पहुंचा पा रहे।

आंकड़े ये कहते हैं-

शुरुआती 1 घंटे में स्तनपान - 43.1 प्रतिशत

0-5 माह में   सिर्फ स्तनपान - 51.5 प्रतिशत

6 माह तक  सिर्फ स्तनपान - 31.1 प्रतिशत

6-9 माह तक  स्तनपान व अल्पठोस आहार - 39.6 प्रतिशत