Thursday, September 9, 2010

बधाई! बाल श्रमिक मुक्त है शहर...?

सर्वेक्षण रिपोर्ट के आंकड़ों को फेर-बदल के साथ प्रस्तुत करने की सरकार की पुरानी आदत है, लेकिन इस बार सरकार ने सुतुरमुर्ग की तरह परेशानी से मुंह ही मोड़ लिया और निश्चिंत बैठ गई । हाल ही, सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में सामने आया कि भोपाल में पिछले दो सालों से कोई बाल श्रमिक नहीं है, जबकि वास्तविक स्थिति से आज प्रदेश का हर एक व्यक्ति परिचित है ।

सच्चाई से मुंह मोड़ती सरकार का  एक नया उदाहरण फिर से एक रिपोर्ट में सामाने आया । हर चार कदम पर दुकानों में पंचर बनाते या ढ़ाबे पर चाय पिलाते छोटू के मिलने के बावजूद सरकारी आंकड़े कहते हैं कि राजधानी में पिछले दो सालों से एक भी बाल मजदूर नहीं है । ऐसी स्थिति में बाल मजदूर के पुनर्वास की कार्यभार से सरकार खुद को मुक्त मानती है । अब सवाल यह उठता है कि आखिर बाल श्रमिकों को ढ़ाबों, रेस्टोरेंट, होटलों और घरेलू कामों से मुक्ति दिलाने के लिए कौन से हाथ आगे आएंगे, जबकि सरकार ही आंखों पर पट्टी बांध कर चैन से बैठी हो।

एक भी बाल श्रमिक नहीं
10 अक्टूबर 2006 से पहले चाइल्ड लेबर ऐक्ट में सिर्फ खतरनाक और गैरखतरनाक कामों में लिप्त बच्चों के पुनर्वास का प्रावधान था, लेकिन अक्टूबर में हुई संशोधन के बाद ऐक्ट में ढ़ाबे, होटल, रेस्टोरेंट और घरों में काम करने वाले बच्चों को भी बाल श्रमिकों में जोड़ लिया गया। सूचना के अधिकार के तहत स्वयंसेवी संस्था विकास संवाद ने जब श्रम मंत्रालय से बाल श्रमिकों के पुनर्वास की जानकारी मांगी तो मंत्रालय द्वारा सूचना प्राप्त हुई कि, संशोधन के बाद भोपाल जिले में बाल श्रमिकों का निरीक्षण लगातार किया गया, जिसमें भोपाल कार्यक्षेत्र में पिछले दो सालों में किसी भी बाल श्रमिक को चिन्हित नहीं किया गया।

केवल एक नियोजक पर जुर्माना
शहर की किसी भी गली में चाय-पान-गुटके की दुकान या पंचर बनाने की दुकान पर आपको छोटू काम करता मिलेगा। यहां तक की सरकारी दफ्तरों में भी बड़े साहब के लिए समय पर चाय पिलाने वाला भी अक्सर छोटू और मुन्ना जैसे ही बच्चे होते हैं, जिन्हें पैसों के लिए रोजाना 10 से 12 घंटे काम करना पड़ता है  । जबकि, मंत्रालय द्वारा प्राप्त जानकारी में बताया गया कि कानून में संसोधन के बाद हुए निरीक्षण में अभी तक मात्र 07 लोग पाए गए, जिनके यहां बाल श्रमिक काम कर रहे थे। इन 7 लोगों में अभी केवल एक ही व्यक्ति पर 10 हजार रुपए की राशि का जुर्माना किया गया है.  जबकि, बाकी सभी आरोपियों की कार्रवाही जारी है ।

पुनर्वास पर ध्यान दे सरकार
इस तरह के आंकड़े देने का मतलब साफ है कि सरकार वास्तवि·ता से मुंह मोड़ रही हैै। गली-मोहल्लों और घरों में काम करने वाले आए दिन नजर आते हैं। इस तरह मुंह मोडऩे से काम नहीं चलेगा। फर्जी आकंड़ेबाजी करने से अच्छा होगा कि बच्चों का पुनर्वास किया जाए।
- शीला खन्ना, अध्यक्ष, मप्र बाल अधिकार संरक्षण आयोग 

1 comment: